Sunday, 15 January 2017

प्राणायाम क्या है ? भाग -१

प्राणायाम योगसाधना का एक महत्वपूर्ण अंग है। जिसके अभाव में योगसाधना का समुचित लाभ प्राप्त नहीं होता है।
प्राणायाम = प्राण + आयाम। इसका का शाब्दिक अर्थ है - 'प्राण (श्वसन) को लम्बा करना' या 'प्राण (जीवनीशक्ति) को लम्बा करना'। इस प्राण जीवन शक्ति को स्वस्थ, स्थिर, नियंत्रित व विस्तृत करना ही प्राणायाम है।
हमारे शरीर का मुख्य आधार प्राणवायु ही है, अगर इसका अस्तित्व शरीर से ख़त्म हो जाये तो इंसान का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता है।

प्राणायाम करते या श्वास लेते समय हम तीन क्रियाएँ करते हैं-
1.पूरक  अर्थात श्वास अंदर लेना
2.रेचक अर्थात श्वास बाहर छोड़ना
3.कुम्भक
 -> आंतरिक कुम्भक अर्थात अंदर श्वास रोकना
 -> बाह्म कुम्भक अर्थात बाहर श्वास रोकना
इसे ही हठयोगी अभ्यांतर वृत्ति, स्तम्भ वृत्ति और बाह्य वृत्ति कहते हैं।




प्राणायाम संबंधी कुछ नियम एवम सावधानियाँ :-
१. प्राणायाम करने से पहले हमारा शरीर अन्दर से और बाहर से शुद्ध होना चाहिए।
२. प्राणायाम करने का स्थान स्वच्छ, हवादार, शांतिमय और पवित्र होना चाहिए।
३. प्राणायाम सुखासन, पद्मासन, सिद्धासन एवम वज्रासन में बैठ के करना चाहिए।
४. बैठने के लिए नीचे अर्थात भूमि पर आसन बिछाना चाहिए।
५. मेरुदण्ड, गर्दन,कमर एवम छाती को सीधा रखें।
६. प्राणायाम के लिए प्रात: एवम सायं का समय उत्तम है।
७. प्राणायाम खाली पेट ही करना चाहिए या भोजन करने के ३-४ घंटे बाद ही करना चाहिए।
८. ज्यादा भूख, किसी तीव्र रोग, ज्वर आदि की समय नहीं करना चाहिए ।
९. प्राणायाम में भोजन विशेष रूप से हल्का एवम सुपाच्य लेना चाहिए।
१०. जिन लोगो को उच्च रक्त-चाप की शिकायत है, उन्हें अपना रक्त-चाप साधारण होने के बाद धीमी गति से प्राणायाम करना चाहिये।
११. ब्रमचर्य(सभी इन्द्रिय जनित सुखो में संयम बरतना) के पालन का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
१२. साँसे लेते समय मन ही मन भगवान से प्रार्थना करनी है कि "हमारे शरीर के सारे रोग शरीर से बाहर निकाल दें और हमारे शरीर में ऊर्जा, ओज, तेजस्विता डाल दें"।

श्वास में पूरक,कुम्भक और रेचक का अनुपात १:४:२ रखना चाहिए।

जल्द ही अगले भाग में प्राणायाम करने के तरीके का उल्लेख करेंगे।

No comments:

Post a comment